वैश्य – मैथिलीशरण गुप्त | वैश्यो! सुना, व्यापार सारा मिट चुका
वैश्यो! सुना, व्यापार सारा मिट चुका है देश का,
सब धन विदेशी हर रहे हैं, पार है क्या क्लेश का?
अब भी न यदि कर्तव्य का पालन करोगे तुम यहाँ-
वैश्यो! सुना, व्यापार सारा मिट चुका है देश का,
सब धन विदेशी हर रहे हैं, पार है क्या क्लेश का?
अब भी न यदि कर्तव्य का पालन करोगे तुम यहाँ-
शूद्रो! उठो, तुम भी कि भारत-भूमि डूबी जा रही,
है योगियों को भी अगम जो व्रत तुम्हारा है वही।
जो मातृ-सेवक हो वही सुत श्रेष्ठ जाता है गिना,
1. मोह, 2. बादल, 3. स्त्री, 4. मधुवन, 5. काले बादल,
6. प्रथम रश्मि, 7. ताज, 8. कला के प्रति, 9. भारतमाता, 10. सुख-दुख
जाग रहे हम वीर जवान,
जियो जियो अय हिन्दुस्तान!
हम प्रभात की नई किरण हैं,
हम दिन के आलोक नवल,
अम्बर के आनन को देखो
कितने इसके तारे टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे
जो छूट गए फिर कहाँ मिले
सूरज ढल रहा है,
शांत समय छा रहा है,
अब विदा होने का
समय आ रहा है।
सुमति स्वदेश छोड़कर चली गई,
ब्रिटेन-कूटनीति से छलि गई,
अमीत, मीत; मीत, शत्रु-सा लगा,
अखंड देश खंड-खंड हो गया।
चश्मा आंखों की नई रोशनी,
करता है नजरों की सहायता।
धूप-छाँव के खेल में साथी,
धुन्दलेपन से दिलाता स्वतंत्रता।
ज्ञान की अग्नि में जलकर जगमगाते हैं हम,
जीवन को सफलता की ऊंचाइयों पर पहुंचाते हैं हम।
ज्ञान की सीढ़ी चढ़कर हम उच्चाईयों को छू सकते हैं,
भिक्षुक
वह आता–
दो टूक कलेजे को करता, पछताता
पथ पर आता।
पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक,
चल रहा लकुटिया टेक,
मुट्ठी भर दाने को — भूख मिटाने को