सुमित्रानंदन पन्त की कविताएँ

सुमित्रानंदन पन्त की कविताएँ

1. मोह

छोड़ द्रुमों की मृदु-छाया,
तोड़ प्रकृति से भी माया,
बाले! तेरे बाल-जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन?
भूल अभी से इस जग को!
तज कर तरल-तरंगों को,
इन्द्र-धनुष के रंगों को,
तेरे भ्रू-भंगों से कैसे बिंधवा दूँ निज मृग-सा मन?
भूल अभी से इस जग को!
कोयल का वह कोमल-बोल,
मधुकर की वीणा अनमोल,
कह, तब तेरे ही प्रिय-स्वर से कैसे भर लूँ सजनि! श्रवन?
भूल अभी से इस जग को!
ऊषा-सस्मित किसलय-दल,
सुधा रश्मि से उतरा जल,
ना, अधरामृत ही के मद में कैसे बहला दूँ जीवन?
भूल अभी से इस जग को!

सुमित्रानंदन पन्त की कविताएँ

2. बादल

सुरपति के हम हैं अनुचर,
जगत्प्राण के भी सहचर;
मेघदूत की सजल कल्पना,
चातक के चिर जीवनधर;
मुग्ध शिखी के नृत्य मनोहर,
सुभग स्वाति के मुक्ताकर;
विहग वर्ग के गर्भ विधायक,
कृषक बालिका के जलधर!

भूमि गर्भ में छिप विहंग-से,
फैला कोमल, रोमिल पंख,
हम असंख्य अस्फुट बीजों में,
सेते साँस, छुडा जड़ पंक!
विपुल कल्पना से त्रिभुवन की
विविध रूप धर भर नभ अंक,
हम फिर क्रीड़ा कौतुक करते,
छा अनंत उर में निःशंक!

कभी चौकड़ी भरते मृग-से
भू पर चरण नहीं धरते,
मत्त मतगंज कभी झूमते,
सजग शशक नभ को चरते;
कभी कीश-से अनिल डाल में
नीरवता से मुँह भरते,
बृहत गृद्ध-से विहग छदों को,
बिखरते नभ,में तरते!

कभी अचानक भूतों का सा
प्रकटा विकट महा आकार
कड़क,कड़क जब हंसते हम सब,
थर्रा उठता है संसार;
फिर परियों के बच्चों से हम
सुभग सीप के पंख पसार,
समुद तैरते शुचि ज्योत्स्ना में,
पकड़ इंदु के कर सुकुमार!

अनिल विलोरित गगन सिंधु में
प्रलय बाढ़ से चारो ओर
उमड़-उमड़ हम लहराते हैं
बरसा उपल, तिमिर घनघोर;
बात बात में, तूल तोम सा
व्योम विटप से झटक, झकोर
हमें उड़ा ले जाता जब द्रुत
दल बल युत घुस बातुल चोर!

व्योम विपिन में वसंत सा
खिलता नव पल्लवित प्रभात,
बरते हम तब अनिल स्रोत में
गिर तमाल तम के से पात;
उदयाचल से बाल हंस फिर
उड़ता अंबर में अवदात
फ़ैल स्वर्ण पंखों से हम भी,
करते द्रुत मारुत से बात!

पर्वत से लघु धूलि, धूलि से
पर्वत बन, पल में साकार
काल चक्र से चढ़ते गिरते,
पल में जलधर, फिर जलधार;
कभी हवा में महल बनाकर,
सेतु बाँधकर कभी अपार,
हम विलीन हों जाते सहसा
विभव भूति ही से निस्सार!

हम सागर के धवल हास हैं
जल के धूम, गगन की धूल,
अनिल फेन उषा के पल्लव,
वारि वसन, वसुधा के मूल;
नभ में अवनि, अवनि में अंबर,
सलिल भस्म, मारुत के फूल,
हम हीं जल में थल, थल में जल,
दिन के तम, पावक के तूल!

व्योम बेलि, ताराओं में गति,
चलते अचल, गगन के गान,
हम अपलक तारों की तंद्रा,
ज्योत्सना के हिम, शशि के यान;
पवन धेनु, रवि के पांशुल श्रम,
सलिल अनल के विरल वितान!
व्योम पलक, जल खग, बहते थल,
अंबुधि की कल्पना महान!

धूम-धुआँरे, काजल कारे,
हम हीं बिकरारे बादल,
मदन राज के बीर बहादुर,
पावस के उड़ते फणिधर!
चमक झमकमय मंत्र वशीकर
छहर घहरमय विष सीकर,
स्वर्ग सेतु-से इंद्रधनुषधर,
कामरूप घनश्याम अमर!

सुमित्रानंदन पन्त की कविताएँ

3. स्त्री

यदि स्वर्ग कहीं है पृथ्वी पर, तो वह नारी उर के भीतर,
दल पर दल खोल हृदय के अस्तर
जब बिठलाती प्रसन्न होकर
वह अमर प्रणय के शतदल पर!

मादकता जग में कहीं अगर, वह नारी अधरों में सुखकर,
क्षण में प्राणों की पीड़ा हर,
नव जीवन का दे सकती वर
वह अधरों पर धर मदिराधर।

यदि कहीं नरक है इस भू पर, तो वह भी नारी के अन्दर,
वासनावर्त में डाल प्रखर
वह अंध गर्त में चिर दुस्तर
नर को ढकेल सकती सत्वर!

सुमित्रानंदन पन्त की कविताएँ

4. मधुवन

आज नव-मधु की प्रात
झलकती नभ-पलकों में प्राण!
मुग्ध-यौवन के स्वप्न समान,–
झलकती, मेरी जीवन-स्वप्न! प्रभात
तुम्हारी मुख-छबि-सी रुचिमान!

आज लोहित मधु-प्रात
व्योम-लतिका में छायाकार
खिल रही नव-पल्लव-सी लाल,
तुम्हारे मधुर-कपोलों पर सुकुमार
लाज का ज्यों मृदु किसलय-जाल!

आज उन्मद मधु प्रात
गगन के इन्दीवर से नील
झर रही स्वर्ण-मरन्द समान,
तुम्हारे शयन-शिथिल सरसिज उन्मील
छलकता ज्यों मदिरालस, प्राण!

आज स्वर्णिम मधु-प्रात
व्योम के विजन कुंज में, प्राण!
खुल रही नवल गुलाब समान,
लाज के विनत-वृन्त पर ज्यों अभिराम
तुम्हारा मुख-अरविन्द सकाम।

प्रिये, मुकुलित मधु-प्रात
मुक्त नभ-वेणी में सोभार
सुहाती रक्त-पलाश समान;
आज मधुवन मुकुलों में झुक साभार
तुम्हें करता निज विभव प्रदान।

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5. काले बादल

सुनता हूँ, मैंने भी देखा,
काले बादल में रहती चाँदी की रेखा!

काले बादल जाति द्वेष के,
काले बादल विश्‍व क्‍लेश के,
काले बादल उठते पथ पर
नव स्‍वतंत्रता के प्रवेश के!
सुनता आया हूँ, है देखा,
काले बादल में हँसती चाँदी की रेखा!

आज दिशा हैं घोर अँधेरी
नभ में गरज रही रण भेरी,
चमक रही चपला क्षण-क्षण पर
झनक रही झिल्‍ली झन-झन कर!
नाच-नाच आँगन में गाते केकी-केका
काले बादल में लहरी चाँदी की रेखा।

काले बादल, काले बादल,
मन भय से हो उठता चंचल!
कौन हृदय में कहता पलपल
मृत्‍यु आ रही साजे दलबल!
आग लग रही, घात चल रहे, विधि का लेखा!
काले बादल में छिपती चाँदी की रेखा!

मुझे मृत्‍यु की भीति नहीं है,
पर अनीति से प्रीति नहीं है,
यह मनुजोचित रीति नहीं है,
जन में प्रीति प्रतीति नहीं है!

देश जातियों का कब होगा,
नव मानवता में रे एका,
काले बादल में कल की,
सोने की रेखा!

सुमित्रानंदन पन्त की कविताएँ

6. प्रथम रश्मि

प्रथम रश्मि का आना रंगिणि!
तूने कैसे पहचाना?
कहाँ, कहाँ हे बाल-विहंगिनि!
पाया तूने वह गाना?
सोयी थी तू स्वप्न नीड़ में,
पंखों के सुख में छिपकर,
ऊँघ रहे थे, घूम द्वार पर,
प्रहरी-से जुगनू नाना।

शशि-किरणों से उतर-उतरकर,
भू पर कामरूप नभ-चर,
चूम नवल कलियों का मृदु-मुख,
सिखा रहे थे मुसकाना।

स्नेह-हीन तारों के दीपक,
श्वास-शून्य थे तरु के पात,
विचर रहे थे स्वप्न अवनि में
तम ने था मंडप ताना।
कूक उठी सहसा तरु-वासिनि!
गा तू स्वागत का गाना,
किसने तुझको अंतर्यामिनि!
बतलाया उसका आना!

सुमित्रानंदन पन्त की कविताएँ

7. ताज

हाय! मृत्यु का ऐसा अमर, अपार्थिव पूजन?
जब विषण्ण, निर्जीव पड़ा हो जग का जीवन!
संग-सौध में हो शृंगार मरण का शोभन,
नग्न, क्षुधातुर, वास-विहीन रहें जीवित जन?

मानव! ऐसी भी विरक्ति क्या जीवन के प्रति?
आत्मा का अपमान, प्रेत औ’ छाया से रति!!
प्रेम-अर्चना यही, करें हम मरण को वरण?
स्थापित कर कंकाल, भरें जीवन का प्रांगण?
शव को दें हम रूप, रंग, आदर मानन का
मानव को हम कुत्सित चित्र बना दें शव का?

गत-युग के बहु धर्म-रूढ़ि के ताज मनोहर
मानव के मोहांध हृदय में किए हुए घर!
भूल गये हम जीवन का संदेश अनश्वर,
मृतकों के हैं मृतक, जीवतों का है ईश्वर!

सुमित्रानंदन पन्त की कविताएँ

8. कला के प्रति

तुम भाव प्रवण हो।
जीवन पिय हो, सहनशील सहृदय हो, कोमल मन हो।
ग्राम तुम्हारा वास रूढ़ियों का गढ़ है चिर जर्जर,
उच्च वंश मर्यादा केवल स्वर्ण-रत्नप्रभ पिंजर।
जीर्ण परिस्थितियाँ ये तुम में आज हो रहीं बिम्बित,
सीमित होती जाती हो तुम, अपने ही में अवसित।
तुम्हें तुम्हारा मधुर शील कर रहा अजान पराजित,
वृद्ध हो रही हो तुम प्रतिदिन नहीं हो रही विकसित।

नारी की सुंदरता पर मैं होता नहीं विमोहित,
शोभा का ऐश्वर्य मुझे करता अवश्य आनंदित।
विशद स्त्रीत्व का ही मैं मन में करता हूँ निज पूजन,
जब आभा देही नारी आह्लाद प्रेम कर वर्षण
मधुर मानवी की महिमा से भू को करती पावन।
तुम में सब गुण हैं: तोड़ो अपने भय कल्पित बन्धन,
जड़ समाज के कर्दम से उठ कर सरोज सी ऊपर,
अपने अंतर के विकास से जीवन के दल दो भर।
सत्य नहीं बाहर: नारी का सत्य तुम्हारे भीतर,
भीतर ही से करो नियंत्रित जीवन को, छोड़ो डर।

सुमित्रानंदन पन्त की कविताएँ

9. भारतमाता

भारत माता
ग्रामवासिनी।
खेतों में फैला है श्यामल
धूल भरा मैला सा आँचल,
गंगा यमुना में आँसू जल,
मिट्टी कि प्रतिमा
उदासिनी।

दैन्य जड़ित अपलक नत चितवन,
अधरों में चिर नीरव रोदन,
युग युग के तम से विषण्ण मन,
वह अपने घर में
प्रवासिनी।

तीस कोटि संतान नग्न तन,
अर्ध क्षुधित, शोषित, निरस्त्र जन,
मूढ़, असभ्य, अशिक्षित, निर्धन,
नत मस्तक
तरु तल निवासिनी!

स्वर्ण शस्य पर -पदतल लुंठित,
धरती सा सहिष्णु मन कुंठित,
क्रन्दन कंपित अधर मौन स्मित,
राहु ग्रसित
शरदेन्दु हासिनी।

चिन्तित भृकुटि क्षितिज तिमिरांकित,
नमित नयन नभ वाष्पाच्छादित,
आनन श्री छाया-शशि उपमित,
ज्ञान मूढ़
गीता प्रकाशिनी!

सफल आज उसका तप संयम,
पिला अहिंसा स्तन्य सुधोपम,
हरती जन मन भय, भव तम भ्रम,
जग जननी
जीवन विकासिनी।

सुमित्रानंदन पन्त की कविताएँ

10. सुख-दुख

सुख-दुख के मधुर मिलन से
यह जीवन हो परिपूरन;
फिर घन में ओझल हो शशि,
फिर शशि से ओझल हो घन!

मैं नहीं चाहता चिर-सुख,
मैं नहीं चाहता चिर-दुख,
सुख दुख की खेल मिचौनी
खोले जीवन अपना मुख!

जग पीड़ित है अति-दुख से
जग पीड़ित रे अति-सुख से,
मानव-जग में बँट जाएँ
दुख सुख से औ’ सुख दुख से!

अविरत दुख है उत्पीड़न,
अविरत सुख भी उत्पीड़न;
दुख-सुख की निशा-दिवा में,
सोता-जगता जग-जीवन!

यह साँझ-उषा का आँगन,
आलिंगन विरह-मिलन का;
चिर हास-अश्रुमय आनन
रे इस मानव-जीवन का!

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