माँ पर कविता हरिवंश राय बच्चन

माँ पर कविता हरिवंश राय बच्चन

आज मेरा फिर से मुस्कुराने का मन किया,
माँ की ऊँगली पकड़कर घूमने जाने का मन किया।

उंगलियाँ पकड़कर माँ ने मेरी मुझे चलना सिखाया है,
खुद गीले में सोकर माँ ने मुझे सूखे बिस्तर पे सुलाया है।

माँ की गोद में सोने को फिर से जी चाहता है,
हाथो से माँ के खाना खाने का जी चाहता है।

ये सुने – 

लगाकर सीने से माँ ने मेरी मुझको दूध पिलाया है,
रोने और चिल्लाने पर बड़े प्यार से चुप कराया है।

मेरी तकलीफ में मुझ से ज्यादा मेरी माँ ही रोयी है,
खिला-पिला के मुझको माँ मेरी, कभी भूखे पेट भी सोयी है।

कभी खिलौनों से खिलाया है, कभी आँचल में छुपाया है,
गलतियाँ करने पर भी माँ ने मुझे हमेशा प्यार से समझाया है।

माँ के चरणो में मुझको जन्नत नजर आती है,
लेकिन माँ मेरी मुझको हमेशा अपने सीने से लगाती है।

Mother Poem in Hindi

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