चुनाव कविता

चुनाव कविता – आखिर संपन्न हुए चुनाव

लोकतंत्र का महापर्व,
दुनिया जिस पर करती गर्व
जनता चाहती सुखद बदलाव
आखिर संपन्न हुए चुनाव…

5 साल का जनादेश,
जीवन भर फिर ऐश ही ऐश
नेता ओढ़ें संतों का वेष,
यद्यपि संत भी अब कहां शेष
दो बुरों में कम बुरा चुनना
वोटर का बढ़ाता मानसिक क्लेश
लोक लुभावन मिथ्या घोषणाओं से
वे कर जाते सदन प्रवेश
जीतते ही उतार देते केंचुली
कोडी की कीमत वालों के,
करोड़ों में बढ़ जाते भाव
आखिर संपन्न हुए चुनाव

त्योहारों का देश हमारा,
पर चुनाव ही शायद राष्ट्रीय त्योहार
विधानसभा, लोकसभा के बाद,
स्थानीय निकाय हो जाते तैयार
अलग प्रदेशों में अलग समय पर
या मध्यावधी की लटकी रहती तलवार
काम तो वैसे भी कहां होते हैं,
पर आचार संहिता की दोहरी पड़ती मार
प्रत्यक्ष खर्च होता अरबों में,
पर अप्रत्यक्ष में खरबों का पड़ता भार
कर्ज में हो जाती और बढ़ोतरी,
ब्याज चुकाती अगली सरकार
फिर भी निष्कर्ष निकलता सहने को,
नए मसीहा का अत्याचार
चुनाव जीतते ही कुछ नेताओं में,
मानवता का हो जाता अभाव
आखिर संपन्न हुए चुनाव

चुनाव कविता

नई सरकार बननी है जल्दी ही,
मतलब पुरानी बोतल में नई शराब
हारने वाले कोसेंगे ईवीएम को,
जीतने पर सिर्फ शराब, शबाब और कबाब
मसीहा जो दिखते थे अब तक,
बदल जाएगा उनका नकाब
वोटिंग प्रतिशत बढ़ा हर चुनाव में,
पर स्तर पहले से ज्यादा खराब
अकेले प्रधानमंत्री की उज्जवल छवि ने,
बढ़ा दिए कई सुनहरे ख्वाब
ईश्वर से है प्रार्थना इतनी,
अब विजेताओं में आए सेवा के भाव
आखिर संपन्न हुए चुनाव

क्या चाहिए हमें नेताओं से,
प्रतीकात्मक मैं करता बखान
रामराज्य संभव नहीं देश में,
पर दिल में थोड़ा तो रख्खें राम
दृढ़ता चाहिए पटेल जैसी,
तो चाहिए शास्त्री जी की सादगी और ईमान
मर्दानगी हो इंदिरा जी जैसी,
जिन्होंने टुकड़े कर दिया पाकिस्तान
नरसिम्हा राव की विद्वत्ता चाहिए,
जो कई भाषाओं का रखते थे ज्ञान
अटल जी तो संपूर्ण चाहिए,
हर गुण उनका राष्ट्रीय सम्मान
मनमोहन सिंह के उदारवाद से,
बेरोजगारी पर लगी लगाम
मोदी जी के राष्ट्रवाद ने
दुनिया भर में बढ़ाया मान
साधु संन्यासियों सी जीवन शैली,
आराम जिनको है हराम
सारे विपक्ष की एक से टक्कर
रोचक है यह महासंग्राम
अंतिम नाम याद आता है मुझको,
जिसका होना था प्रथम स्थान
किसी भी त्रुटि से रहित, समस्त सद्गुणों सहित,
नाम जिसका अब्दुल कलाम
जितनी भी हो सकती अच्छाई इन्सान में,
वह था उन अच्छाइयों की खान
नेता नहीं पर वह भारत का रत्न था,
ससम्मान मैं करता प्रणाम
राम और कलाम के आदर्शों में,
नए नेतृत्व का हो जुड़ाव
सद्बुद्धि दे ईश्वर उन सबको,
चाणक्य के सपनों का देश बनाओ
नेता से बड़ा दल है, दल से बड़ा देश,
देश से बड़ा नहीं चुनाव
मौका मिला है जनसेवा का,
स्वयंसेवा में नहीं गवाओ
बधाई आप सभी को आखिर संपन्न हुए चुनाव

चुनाव कविता